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ज़रूरी है | Zaruri Hai | By Akhilesh Dwivedi | ThinkTank Akhil

ज़रूरी है यह शहर है अनजानों का, नए हैं सब यहां गुजार सकूं कुछ दिन तो जान पहचान ज़रूरी है। कहां घूमते हैं गलियों में आवारा इस शहर में अपना एक मकान ज़रूरी है। उन्हें इश्क़ हो किसी से भला यह मुनासिब कहां है  हर गली में हो उसका कद्रदान ज़रूरी है। कहां जाओगे जब निकलोगे घर से बाहर मंज़िल मिले जहां ऐसा स्थान ज़रूरी है। ना जाने किस भीड़ में वो खो गई अमानत मेरी बची इंसानियत हो जिसमें वो इंसान ज़रूरी है। जाति, धर्म और भाषाओं में बांट दिया है फायदे के लिए हमारे लिए तो बस भारत की शान ज़रूरी है। ✍️ -अखिलेश द्विवेदी Follow Friends, If you like the post, comment below and do share your response. Thanks for reading 😃

मै क्यों लिखता हूं | Mai Kyu Likhata Hu | By Akhilesh Dwivedi | Think Tank Akhil

मै क्यों लिखता हूं? निर्जीव पड़े हैं कितने यहां एक रोशनी की तलाश में, अंधियारे में रात गुजरती उजियारे की आस में। जलती धूप में महल बनाया फरमाते वो जिसमे आराम, गर्म कर रहे अपनी जेबें मजबूरों से करवाते काम। फिर मुझसे कहते हैं कि मै क्यों नहीं चुप रहता हूं? मुस्कुरा सकती थी जो इस जग में उम्मीदों की लिए उड़ान, अंतरिक्ष में जा सकती जो सपना होता जिनका आसमान, जन्म से पहले उन्हें मार दिया कर सकती थी जो ऊंचा नाम। फिर कहते हो तुम मै यह सब क्यों लिखता हूं? अरे! थक गई हैं आंखे मेरी हाथो से दर्द बयां करता हूं, कुछ और नहीं है कहने को बस इसीलिए मै लिखता हूं। बस इसीलिए मै लिखता हूं।। ✍️ -अखिलेश द्विवेदी संपादक - शालू शर्मा  Follow Friends, If you like the post, comment below and do share your response. Thanks for reading 😃

जो थे कभी अपने अंजान हो गए | Jo The Kabhi Apne Anjaan Ho Gaye | By Akhilesh Dwivedi | Think Tank Akhil

जो थे कभी अपने अंजान हो गए बनाया हमने जिनको वो अब भगवान बन गए, दूर से दिख रही थी कुछ रोशनी पास जाकर देखा तो अपने ही मकान जल गए। उन रिश्तों की अहमियत बचाने में रह गए जो थे अपने पर बेगाने ही रह गए, वो आए और घर मेरा ही फूंक दिया आग घर के जिसकी हम बुझाने में रह गए। बड़ा अजीब था वाक़िआ वो हम उसे ही सुलझाने में रह गए, जिस किसी ने दिया दिलासा मुझे वो मेरे ही घर में अपनी भूख मिटाने में रह गए। मैं ढूंढता रहा कोई सच्चा साथी और ढूंढने में जिसे जमाने निकल गए, जब मिला है वो एक अर्से बाद तो कुछ किस्से यार पुराने निकल गए। ✍️ -अखिलेश द्विवेदी Follow Friends, If you like the post, comment below and do share your response. Thanks for reading 😃

क्या इसी लिए हमने आजादी पाई थी | Kya Isi Liye Humne Azadi Paai Thi | Independence Day | Think Tank Akhil

क्या इसी लिए हमने आजादी पाई थी? धर्म के नाम पर गला काट दिया भाषाओं के नाम पर हमें बांट दिया, फूलों को भी हमने उनकी जाति बताई थी, क्या यही सोचकर उन लोगों ने यह क्रांति चलाई थी? क्या हुआ उनके सपनों का, जो सोचा था उन वीरों ने, जिस अखंड भारत के लिए वो जकड़ गए जंजीरों में, क्या उनके मन में भी कभी सत्ता की लालच आई थी? क्या इसी लिए हमने आजादी पाई थी? बेटियां गर्भ में मरती हैं या फिर मरती हैं अंधियारों में, क्या इसी भारत के लिए वो थे चारदीवारों में? जो सोचा था उन लोगों ने बस एक ख्याली खीर बनाई थी, क्या इसी लिए हमने आजादी पाई थी? ✍️ -अखिलेश द्विवेदी Follow Friends, If you like the post, Comment below and do share your response. Thanks for reading 😃

लगता है कि तुम हो | Lagta Hai Ki Tum Ho | Beautiful Thought | Think Tank Akhil

लगता है कि तुम हो  राहत सी जो दे जाए तो लगता है कि तुम हो परछाई कोई लहराए तो लगता है कि तुम हो। जब बारिश के सुहाने मौसम में कोई बूंद टकराए तो लगता है कि तुम हो। काली तन्हाँ रातें जब सताए चैन कहीं ना आए तो लगता है कि तुम हो। समुंदर की बलखाती लहरों में कोई मोती उतर जाए तो लगता है कि तुम हो। कंकरीले पथरीले चट्टानों में कोई झरना बह जाए तो लगता है कि तुम हो। सुनसान गुजरती अकेली राहों में कोई हाल पूछ जाए तो लगता है कि तुम हो। ✍️ -अखिलेश द्विवेदी Follow Friends, If you like the post, comment below and do share your response. Thanks for reading 😃

कैसे? | Jo Dikh Raha Use Chhipaye kaise | Emotional Lines | Think Tank Akhil

कैसे? जो दिख रहा है उसे छिपाएं कैसे जमाने की चाहत है जो वो बन जाएं कैसे। महफिल लगाना तो बहुत दूर की बात रही फैसला हो की खुद की आबरू बचाएं कैसे। ना जाने कितने आए तोड़ने हौसले जो कभी भुला नहीं उसे भूल जाएं कैसे। मिट्टी की याद मिटा देना आसान नहीं है अपने शहर को छोड़कर कहीं जाए कैसे। लोग रोते रहे, सबको रुलाते रहे खुश आंखों के आंसू को हम छिपाएं कैसे। हर नज़र को ना अच्छे दिखे हम एक बूंद को समंदर नज़र आए कैसे। ✍️ -अखिलेश द्विवेदी Follow Friends, If you like the post, comment below and do share your response. Thanks for reading 😃

उसकी याद में आंखें नम कर के रोया | Usaki Yaad Me Ankhe Nam Karke Roya- Emotional Poem By Akhilesh Dwivedi | Think Tank Akhil

उसकी याद में आंखें नम कर के रोया अकेले राहों में हर कदम पर रोया, तनहाई अकेले नहीं मिटती कभी कभी वो मिला तो उससे बिछड़ कर रोया। बहार आई कई बार उसके दरवाजे पर कभी ओस तो कभी बारिश बनकर रोया। रोज सोया नहीं मै मखमल के बिस्तर पर कभी पत्थर को मखमल समझकर सोया। वो पल नहीं जब वो याद ना आए उसकी यादों के तकिए से लिपटकर रोया। ✍️ -अखिलेश द्विवेदी Follow Friends, If you like the post, Comment below and do share your response. Thanks for reading 😃

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